आचार्य १०८ श्री विशुद्ध सागर जी महाराज

Vishuddha Vachan


व्यक्ति की महानता अहं से नही विनय से प्रकट होती है।

निज देव से मिलने के लिए जिनदेव से मिलना अनिवार्य है।

गुरु एक दिव्य नेत्र ही नही, प्रकाश युक्त दीपक भी है।

वाणी कर्मबधं भी करा देती है, वाणी कर्म बधं से मुक्ति भी करा देती है।

जैन-दर्शन मे सल्लेखना को जीवन का श्रृंगार कहा गया है।

सर्वगुणो मे प्रधान गुण विनय गुण है।